मेरे लिए तुम उस चाँद की तरह हो
जिसे मैं देख तो सकती हूँ
पर कभी उसे पा नहीं सकती...
जिसे मैं देख तो सकती हूँ
पर कभी उसे पा नहीं सकती...
मेरे लिए तुम उस चाँद की तरह हो
जिसकी तरफ मैं हाथ तो बढ़ा सकती हूँ
पर कभी उसे छू नहीं सकती...
जिसकी तरफ मैं हाथ तो बढ़ा सकती
पर कभी उसे छू नहीं सकती...
मेरे लिए तुम उस चाँद की तरह हो
जिसे मैं करीब महसूस तो करती हूँ
पर कभी उसके नज़दीक जा नहीं सकती...
पर कभी उसके नज़दीक जा नहीं सकती
मेरे लिए तुम उस चाँद की तरह हो
जिसकी रौशनी में, मैं खुदको पहचानना चाहती हूँ
पर हमेशा रात के अँधेरे में खोजाती हूँ...
जिसकी रौशनी में, मैं खुदको पहचानना चाहती हूँ
पर हमेशा रात के अँधेरे में खो
मेरे लिए तुम उस चाँद की तरह हो
जिसकी गहराई में, मैं डूब जाना चाहती हूँ
पर खुदको हमेशा किनारे पर ही पाती हूँ...
जिसकी गहराई में, मैं डूब जाना चाहती हूँ
पर खुदको हमेशा किनारे पर ही पा
मेरे लिए तुम वो चाँद हो
जो ना कभी मेरी ज़मी पर आएगा
और ना कभी मेरा हो पायेगा
पर फिर भी वो तुम हो...
जो ना कभी मेरी ज़मी पर आएगा
और ना कभी मेरा हो पायेगा
पर फिर भी वो तुम हो...
- सृजना
.........par phir bhi wo tum ho,
ReplyDeletewo tum hi ho,jo mujhe
har ek sitare me nazar ata hai,
chand to bas bahana hai,
chehra to usme bhi tumahra hi nazar ata hai.
another nice poem frm ur heart...
ReplyDelete:))
bahut badhiya
ReplyDeleteअच्छी कविता
ReplyDeleteबेहद खूबसूरती से आपने भावो को शब्द दिया है.
ReplyDeleteबेहतरीन रचना के लिए बधाई.
Ab to nafarat ho gayi hai is din ke ujale se, rah dekhta hun us raat ki, jisme bus sirf tum hi tum ho...Dilin
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